जहां कभी धान तक पैदा नहीं हुई, अब वहां हो रही देश के सबसे बड़े सीताफल की खेती

भिलाई। ये इस देश की धरती का ही कमाल है कि पथरीली जमीन पर भी सोना उगा दे। जिस एग्रो उद्योग को लेकर छत्तीसगढ़ सरकार आगे बढ़ रही है, उसे दस साल पहले ही दुर्ग जिले के दो किसान ने हकीकत में बदलकर दिखा दिया। आज यह सिर्फ फार्म हाउस नहीं, बल्कि कृषि पर किए गए प्रयोगों का विश्वविद्यालय बन चुका है। जिस पथरीली जमीन पर धान की खेती भी नहीं होती थी, वहां अब देशी-विदेशी फल निकल रहे हैं। यहां की खेती को हिन्दुस्तान के सबसे बड़े सीताफल की फार्मिंग का तमगा भी मिला हुआ है।

हम बात कर रहे हैं दुर्ग-बेमेतरा जिला के सरहद पर बसे ग्राम मोहरेंगा स्थित जेएस फार्म की…। किसान अनिल शर्मा और वजीर सिंह लोहान ने आधुनिक और जैविक खेतों का ऐसा कारनामा कर दिखाया जो पत्थर में फूल खिला देने वाली कहावत को चरितार्थ कर रही है। ड्राइ जोन, बंजर जमीन वह भी लाल मुरम…।

इस पर खेती एक, दो या पांच एकड़ नहीं बल्कि 500 एकड़…। ऐसी पथरीली व मुरम जमीन पर किसानों ने आर्गेनिक खेती कर यह साबित कर दिया है कि जहां चाह है वहीं राह भी है। खुद की मेहनत से देशी और विदेशी 16 प्रकार के फल की पैदावार कर रहे हैं। यहां कुल एक लाख 25 हजार पेड़ लगाए गए हैं।

सबसे ज्यादा 180 एकड़ जमीन पर सिर्फ सीताफल की खेती हो रही है, जिसे हिन्दुस्तान में सबसे बड़े भू-भाग में सीताफल के आर्गेनिक खेती का दावा किया जा रहा है। इस आधुनिक और जैविक खेती को देखने राजनेता, केंद्र व राज्य सरकार के बड़े अफसरों के साथ कृषि प्रेमी पहुंचते हैं। यहां कृषकों को उन्नात खेती की जानकारी देने के साथ इस फार्म हाउस में आधा दर्जन गांवों के 300 से ज्यादा लोगों को रोजगार भी मिल रहा है।

तीन तालाबों में 25 करोड़ लीटर पानी स्टोरेज

जेएस फार्म के संचालक अनिल शर्मा बताते हैं कि यहां पहले मुरम का मैदान था। धीरे-धीरे जमीन खरीदते गए। 500 एकड़ के इस फार्म में 100 से ज्यादा बोर खनन हुए होंगे, लेकिन खेती लायक पानी कहीं भी नहीं मिला। इस जमीन पर कभी धान भी पैदा नहीं हुआ। फिर खेत से पांच किमी दूर खजरी गांव में जमीन खरीदी। वहां दो बोर खनन के बाद पानी मिला।

अंडरग्राउंड पाइप के सहारे पानी लाने का प्रयास किए, लेकिन आशानुरूप सफलता नहीं मिली। इसके बाद भी हिम्मत नहीं हारी। फिर मुरम वाली जमीन पर ही कुछ करने की ठानी। ऊपर-नीचे जमीन पर ऐसा ड्रेनेज तैयार किया, जिससे बरसात के पानी को रोका जा सके। पहले 10 एकड़ में 42 फीट गहराई का तालाब खोदवाया।

पानी कम पड़ने पर तालाबों की संख्या बढ़ाते गए। अब तीन तालाबों में 25 करोड़ लीटर पानी स्टोरेज है। पानी की एक बूंद भी व्यर्थ नहीं बहता और इसी से पूरी आर्गेनिक खेती होती है। अनिल शर्मा बताते हैं कि बारिश का पानी तालाब में स्टोर करने की वजह से आसपास के बोर जो सूखे थे, उनमें भी पानी आने लगा है।

मन मोह लेगा मोहरेंगा का जेएस फार्म

उन्नत कृषक अनिल शर्मा बताते हैं कि बंजर और पथरीली जमीन के हर भाग का उपयोग फ्रूट उत्पादन में कर रहे हैं। लगभग 50 एकड़ जमीन सड़कों के लिए छोड़ा गया है। सड़क के दोनों किनारे ड्रैगन फ्रूट, कटहल व नारियल के पौधे लगाए गए हैं। फार्म हाउस के फेंसिंग किनारे करौंदा का पेड़ है। फार्म हाउस में ग्रीन हाउस और तालाब के बंड (पार) पर आकर्षक गार्डन भी बनाए गए हैं।

इसके अलावा खेत के हर हिस्से में सूचनात्मक बोर्ड भी लगा है, जिसमें फसल की संख्या व लगाने की तिथि का उल्लेख है। कुल मिलाकर मोहरेंगा का यह जेएस फार्म प्रकृति व कृषि प्रेमियों का मन मोह लेगा। अनिल शर्मा बताते हैं कि ऑटोमेशन से पानी की सिंचाई होती है।

पानी की उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए ड्रिप पद्धति से बूंद-बूंद पानी का उपयोग करते हैं। पिछले तीन वर्षों से उनके यहां का सौ फीसदी आर्गेनिक स्वादिष्ट फल दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नाई जैसे महानगरों के अलावा ओडिशा, मध्यप्रदेश, हरियाणा, गुजरात व छत्तीसगढ़ में बिक रहे हैं।

ओटेमेशन सिस्टम से हर पेड़ तक पहुंचता है खाद और पानी

फार्म हाउस के इंचार्ज राजेश पुनिया बताते हैं कि वर्मी खाद तैयार करने के लिए उन्हें केंचुओं की जरूरत थी। इसके लिए उन्होंने कृषि व उद्यान विभाग से संपर्क किया, लेकिन उन्हें यहां से केंचुए नहीं मिल पाए। बाहर से केंचुए के बीज लेकर आए। इन केचुओं को चारा खिलाने वाली टंकियों में गोबर व पत्तियों के बीच डाल दिया। महीनेभर में दस एकड़ में डालने लायक केचुए तैयार हो गए।

वर्मी कम्पोस्ट खाद बनाने की शुरुआत साल 2010 में की थी और अब वह 80 फीट जगह पर चार ब़ड़ी सीमेंट टंकियों में वर्मी कम्पोस्ट तैयार कर रहे हैं। इस कम्पोस्ट को पेड़ों की जड़ में डालते हैं, जिससे पेड़ों को बढ़ने के लिए अनुकूल माहौल मिलता है। उनका कहना है कि एक केचुआ सालभर में लगभग एक टन खाद बनाता है।

इसके अलावा गीर नस्ल के 100 से ज्यादा गायों के गोबर, गौमूत्र, बेसन, मिट्टी से जीवामृत तैयार किया जाता है। साढ़े छह लाख लीटर का अंडरग्राउंड पानी टैंक है, जिसमें पानी फिल्टर होकर आता है और उसमें ही जीवामृत को मिलाकर आटोमेशन सिस्टम से प्रत्येक खेतों तक खाद और पानी पहुंचता है।

किस प्रजाति के फलों की खेती

सीताफल- 180 एकड़, अमरुद (जाम) – 50 एकड़, एप्पल बेर – 50 एकड़, चीकू – 10 एकड़, मौसबी – 10 एकड़, अंजीर – 05 एकड़, आम – 25 एकड़, नींबू – 10 एकड़, ड्रैगन फ्रूट – 10 एकड़, नारियल – 08 एकड़, खजूर – 08 एकड़…। इसके अलावा 25 एकड़ में विभिन्ना प्रजाति के फलों की खेती कर रहे हैं। वहीं गौशाला में पल रहे गीर नस्ल के गायों के लिए जैविक हरी घांस भी यहीं पैदा की जाती है।

देशवासियों के लिए पैदा कर रहे पौष्टिक फ्रूट

आज के युवा खेती-किसानी से दूर भाग रहे हैं, जबकि खेती इंडस्ट्री का रूप ले चुका है। सही तकनीक और लंबे समयावधि के लिए खेती करें तो अन्नादाता कहलाने वाले किसान फलदाता कहलाने लगेंगे। हम सिर्फ आर्गेनिक खेती करते हैं। हमारा उद्देश्य देशवासियों को सिर्फ पौष्टिक फ्रूट ही उपलब्ध कराना है, ताकि स्वास्थ्य से खिलवाड़ न हो। यहां आने वाले लोगों को प्रशिक्षण के साथ मार्गदर्शन भी देते हैं। – अनिल शर्मा, जेएस फार्म, मोहरेंगा

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