पहाड़ी कोरवा: क्षोभ से भरा एक स्मृति शेष…

जशपुर से सन्ना की यात्रा पर जाएं तो हर्रापाठ अक्सर पचमढ़ी की याद दिलाता है। वहां पहुंचने पर महाश्वेता देवी की आदिवासी कथा परिलक्षित होती नजर आती है- जिसमें वो लिखती हैं कि आदिम मतलब शून्यता या रिक्तता नहीं, बल्कि अप्रितम सौंदर्य से लक्षित। ये यात्रा अगर ठंड के मौसम में हो तो आपको उत्तराखंड में होने का भ्रम हो सकता है।

जशपुर उरांवों की बसाहट के लिए जाना जाता है। दूसरी सबसे बड़ी बसाहट पहाड़ी कोरवाओं की है। लेकिन इनसे जुड़ा ‘पहाड़ी’ शब्द अब छद्म प्रतीत होता है। किसी समय में इनकी प्रशस्ति किसी भी दूसरे आदिवासियों से ज्यादा थी। नब्बे के शुरूआती दशक में मैनें खुद नार्वे और ब्रिटेन की दंपतियों को पहाड़ी कोरवाओं के बच्चों को ले जाते देखा है। ये सामान्य सी बात लगती है लेकिन इसके मायने बहुत ज्यादा हैं। जिसे समझने की कोशिश किसी ने नहीं की।

उरांव जशपुर में झारखंड-बिहार से आए। लेकिन पहाड़ी कोरवा संभवत: यहां बहुत पहले से रहते थे। (थे शब्द का इस्तेमाल पहाड़ी संदर्भ में सही है।) इन्हें प्रकृति के सबसे करीब रहने का सौभाग्य हासिल था। शरीर पर कपड़े के रूप में लंगोट ही काफी था। लंबे बाल, नुकीली मूछें 90 प्रतिशत पुरुषों के लिए पहचान का विषय हुआ करती थीं। महिलाएं साड़ी पहनती थीं लेकिन ब्लाउज का चलन नहीं था। यही जनजाति उस इलाके में तीर-धनुष लिए दिखती थी। किसी प्रदर्शन या परंपरा के लिए नहीं, बल्कि ये उनकी आवश्यकता का प्रतीक था। आखेटन ही इनका व्यवसाय था। जो जानवर इन्हें उपलब्ध होते थे, उनका शिकार ही इनकी भूख मिटाता था। सालबीज और महुए की ‘कुहड़ी’, जंगल में उगने वाले कंदमूल शिकार न हो पाने की स्थिति में वैकल्पिक भोजन हुआ करता था।

आमतौर पर इनकी भाव-भंगिमाएं दूसरे आदिवासियों को भी असहज करती थीं। दूसरे आदिवासी बच्चों के लिए ठीक वैसे ही थे जैसे गब्बर सिंह का चरित्र। बच्चों को नियंत्रण में रखने के लिए माएं अक्सर इनका उल्लेख करती थीं। कहती थीं कि- ज्यादा बदमाशी करोगे तो ये कान काटकर ले जाएंगे। मैनें भी बचपन की मानसिकता में इन्हें कनकटवा के रूप में ही देखा। ये शब्दों को चबा कर उच्चारण करते थे। सुनने में बहुत तीखे लगते थे।

कुछ अंतराल बाद मैनें इन्हें लकड़ी बेचते देखा। जंगल से गांव में उतरने की पहली सीढ़ी संभवत: ये लकड़ी ही थी। अलसुबह चीरी गई लकड़ी छोटे-छोटे होटलों में 5-10 रुपए गट्‌ठे में बिक जाती थी। संभवत: मुद्रा से पहले परिचय का अवसर इस लकड़ी ने ही दिया होगा।

इनको और करीब से जानने का अवसर तब मिला जब ‘धांगर’ के रूप में एक हमउम्र पहाड़ी कोरवा बनबीर मिला। देखा जाए तो मेरे जीवन में आने वाला बहुमुखी प्रतिभा वाला पहला शख्स वही था। बांसुरी बजा लेता था। अचूक निशाना था। गुलैल से छूटा हर पत्थर निशाने पर ही लगता था। घर के किसी भी सदस्य की हूबहू मिमिक्री कर लेता था। वो अक्सर कहता था कि जिस दिन पहाड़ी कोरवाओं के पास पैसे कमाने की बुद्धि आ जाएगी, वे खत्म हो जाएंगे। आज 20 साल बाद जब मैं उस बात को याद करता हूं तो लगता है कि उसने कितनी सहजता से भविष्य में होने वाली एक बड़ी परिघटना का आकलन कर लिया था।

बनबीर ही बताया करता था कि उनके कुनबे का पूरा जीवन 40 किमी के रेडियस में खत्म हो जाता है। पहाड़ के पठारी हिस्से में बने एक तंगहाल कामचलाऊ झोपड़ी में जन्म, 20 किमी दूर गांव की लड़की से शादी। सबसे दूर का रिश्तेदार 30 किमी के दायरे से दूर नहीं। इसी छोटे से भौगोलिक दायरे में इनकी 70 साल की औसत आयु कब अपनी उम्र को पूरा कर लेती थी, पता ही नहीं चलता था। बनबीर ने ही मुझे यह बताया था कि शादी करने के बाद वह गांव में ही दूसरे लोगों की तरह बस जाएगा। धांगर तो वो इसलिए बना कि गांव के बाकी लोगों के साथ मेलजोल हो जाए। तब मुझे बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि ये सिर्फ बनबीर का अपने मूल से पलायन नहीं था, बल्कि ये तो उस बड़ी प्रक्रिया का हिस्सा मात्र था जिसमें एक पूरी जनजाति की विरासत अपने आकार को बिना किसी से कोई सर्टिफिकेट लिए बदल रही थी। और शायद इस पूरी प्रक्रिया को देखने समझने की फुर्सत या रुचि किसी में नहीं थी।

मैनें उस दौर में बनबीर को बहुत बार देश के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के बारे में बताने की कोशिश की। मैं बताता था कि ये देश के पहले राष्ट्रपति हुए। उन्होंने ही पहाड़ी कोरवाओं को गोद लिया। तुम सब सरकारी नजर में उनके दत्तक पुत्र हो। किसी राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र होने का सौभाग्य सिर्फ तुम लोगों को ही हासिल हुआ है। हर बार बहुत लंबी-लंबी बातें करने के बाद अहसास होता कि उसे मेरी बातों में कोई इंट्रेस्ट नहीं है। और फिर बात खत्म हो जाती थी। ठीक उसी तरह जैसे ये पहाड़ी कोरवाओं की एक विशाल सांस्कृतिक पहचान खुद को इतिहास में दर्ज कराए बगैर चुपचाप विलुप्त हो गई। जिस तरह बनबीर को मेरी बातों में कोई इंट्रेस्ट नहीं था, उसी प्रकार आज के दौर में इस गंभीर पहलू पर शायद किसी को कोई इंट्रेस्ट नहीं है। हो सकता है आने वाले समय में तमाम जनजातियों का वैसा ही हश्र हो, जैसा पहाड़ी कोरवाओं के साथ हुआ।

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